मंदसौर में किसानों की मौत के बावजूद कैसे जीती भाजपा

पंद्रह साल के वनवास के बाद आख़िरकार मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है.
लेकिन एक बात जो कई लोगों के गले से नीचे नहीं उतर रही है, वो ये कि मंदसौर की चार सीटों में से भाजपा तीन सीटें कैसे जीत गई.
आठ जून 2017 को पुलिस फ़ायरिंग में मंदसौर में छह किसान मारे गए थे. पिछले कुछ वक़्त से देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान आंदोलन करते रहे हैं लेकिन इस घटना ने किसानों की नाराज़गी को और बढ़ाया था.
भाजपा ने इस घटना में कांग्रेस से जुड़े समाजविरोधी लोगों का हाथ बताया था, लेकिन ऐसी ख़बरें आईं कि स्थानीय पाटीदार किसान इस कारण भाजपा से बेहद नाराज़ थे.
भाजपा के सुधीर गुप्ता और कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा कई नेताओं ने मंदसौर का दौरा किया था.
मरने वालों में चार- अभिषेक, बबलू, कन्हैयालाल, चैनराम का ताल्लुक पाटीदार समुदाय से था.
मंदसौर की चार सीटों- मलारगढ़ रिज़र्व, मंदसौर प्रॉपर, सुवासरा और गरोढ में पाटीदार समुदाय के 60-70 हज़ार वोट है.
सुवासरा में कांग्रेस की विजय हुई जबकि बाक़ी सीटें भाजपा के खाते में गईं.
भोपाल में किसान नेता शिवकुमार शर्मा नतीजों से चकित हैं और ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाते हैं.
वो कहते हैं कि उन्होंने अन्नदाता अधिकार यात्रा की, "सात हज़ार किलोमीटर की दूरी तय की, पुलिस की गोली में छह किसान मारे गए, सात हज़ार किसानों पर फ़र्ज़ी मुकदमें बने", उसके बावजूद ऐसे नतीजे़ क्यों आए, ये उनकी समझ से बाहर हैं.
मंदसौर में पाटीदार समाज ज़िला अध्यक्ष अमृतराम पाटीदार ईवीएम से जुड़े आरोपों को ख़ारिज करते हैं, लेकिन कहते हैं उनको "समझ नहीं आ रहा है" कि भाजपा कैसे जीत गई.
वो कहते हैं, "वोट के दो दिन पहले तो लोग कह रहे थे कि वो भाजपा के खिलाफ़ वोट देंगे लेकिन ऐसा लगता है कि लोगों ने फिर भी भाजपा को ही वोट दिया है. ईवीएम की सुरक्षा के लिए उम्मीदवारों के लोग बाहर पहरा दे रहे थे."
मंदसौर में स्थानीय पत्रकार आकाश चौहान भी नतीजों को समझने की कोशिश कर रहे हैं.
भोपाल में वरिष्ठ पत्रकार राजेश चतुर्वेदी और ऋषि पांडे का भी कुछ यही हाल है.
आकाश चौहान के मुताबिक उन्होंने किसान आंदोलन को बहुत नज़दीक से कवर किया और उन्हें एक व्यक्ति भी नहीं मिला जिसने कहा हो कि वो भाजपा को वोट करेगा.
वो कहते हैं, "मंदसौर में जीएसटी को लेकर विरोध था. लोग गुस्से में थे. लोग भाजपा के विरोध में थे न कि कांग्रेस के पक्ष में. जादू तो हुआ नहीं होगा."
याद रहे कि मीडिया में किसानों की ऐसी तस्वीरें और कहानियां आई थीं जिनके मुताबिक किसान अपना माल कौड़ियों में बेच रहे थे. अख़बार मिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ किसान लहसुन दो रुपए किलो के दाम पर बेचने को मजबूर थे.
मंदसौर राज्य के मालवा निमाड़ का हिस्सा है, जो मध्य प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण कृषि का इलाक़ा है.
मध्य प्रदेश सामाजिक विज्ञान शोध संस्थान उज्जैन के निदेशक और लोकनीति-सीएसडीएस के स्टेट कोआर्डिनेटर यतींद्र सिंह सिसोदिया के अनुसार प्रदेश में किसानों की नाराज़गी को बढ़ाचढ़ाकर पेश किया और सरकार की कई स्कीमों के कारण किसान ख़ुश थे.
शायद किसानों को एक ब्लॉक की तरह लेना, समझना सही नहीं होगा. किसान छोटे और बड़े होते हैं. ऐसे किसान होते हैं जो किराए की ज़मीन पर काम करते हैं. इसके अलावा खेत में काम करने वाले मज़दूरों की भी अच्छी खासी तादाद है.

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