चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम
बीजेपी से अलग होने की बात पर मुकेश कहते हैं कि, "अगर तीर हाथ में रहे तो अलग निशाना लगाया जा सकता है. लेकिन जब तीर हाथ से छूट जाए तो कुछ नहीं हो सकता. वो जिस किसी के सीने में जाएगा, चुभेगा ही."
"अमित शाह ने हमसे गद्दारी की और तब हमारी पॉलिटिकल पार्टी भी नहीं थी. अब हम खुद एक पॉलिटिकल पार्टी हैं, इसलिए उस गद्दारी का हिसाब चुकाने के लिए पॉलिटिकल समझौता किया और लड़ाई लड़ रहे हैं."
लेकिन, जानकार कहते हैं कि सभी मुकेश सहनी को इसलिए भी साथ रखना चाहते हैं क्योंकि इनके पास पैसा बहुत है. अपनी रैलियों और प्रचार-प्रसार में मुकेश ने पैसे की ताक़त भी दिखाई है. फिर चाहे वह चार्टर्ड विमान से पटना आना हो, अख़बारों में बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाना हो, हेलिकॉप्टर से अपने क्षेत्र के दौरे पर निकलना हो या फिर रैलियों में साज-सज्जा और इंतज़ाम की बात हो.
कहते हैं कि राजनीति के शुरुआती दिनों में मुकेश को पटना के किसी होटल में ठहरना पसंद नहीं था. क्योंकि उन्हें यहां की सुविधाएं और इंतजाम नाकाफी लगते थे. चर्चा है कि आगामी चुनाव में भी मुकेश के पैसे की धमक देखने को मिलेगी.
लेकिन, इन सारी चर्चाओं पर तब विराम लग जाता है जब पैसे की बात पर मुकेश कहते हैं, "देखिए मैं मछुआरा का बेटा हूं. मेरे पास पहले की कोई संपत्ति नहीं है. हां, हमने पैसे कमाये हैं और यह काली कमाई नहीं, एक नंबर का पैसा है. एक-एक पैसे का हिसाब है. इनकम टैक्स देता हूं. कमाए हुए पैसे अपने लोगों के लिए खर्च करता हूं. और उतना भी पैसा नहीं है जितना लोग कहते हैं."
मूल रूप से दरभंगा के सुपौल बाज़ार के रहने वाले मुकेश सहनी संजय लीला भंसाली की फ़िल्मों के सेट डिजाइन कर सुर्खियों में आए थे. फिलहाल वो मुंबई में मुकेश सिनेवर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के मालिक हैं. जिसका बेस कैपिटल पांच लाख रुपये है. कंपनी 2013 में ही बनी थी.
मुकेश पहली बार खगड़िया से चुनाव लड़ेंगे. लेकिन उनका घर दरभंगा में है और चर्चा भी यही थी कि महागठबंधन उन्हें दरभंगा से अपना उम्मीदवार बनाएगा. बाद में जब दरभंगा से आरजेडी के अब्दुल बारी सिद्दिकी के नाम पर मुहर लग गई तब यह कयास लगाए जाने लगे कि मुकेश को मुज़फ़्फ़रपुर सीट दी जाएगी.
आखिर में खगड़िया से क्यों? जवाब में सहनी कहते हैं, "समझौते के तहत हमें तीन सीटें लेनी थी. चूंकि खगड़िया नया सीट था. इसलिए हमने उसे चुनौती के रूप में लिया. जहां तक बात मुज़फ़्फ़रपुर सीट की है तो हम वहां से क्यों लड़ें जहां से हमारे लोग जीत सकते हैं?"
"मेरे खयाल से सीटें उतना मायने नहीं रखती हैं, जितना कि मायने रखता है बीजेपी को हराना."
सवाल फिर वही कि क्या मुकेश सहनी को तीन सीटें इसलिए मिली हैं क्योंकि (उनके दावे के मुताबिक) वे निषाद समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं ?
बीजेपी के प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं, "ऐसा नहीं कि मुकेश निषाद समुदाय के अकेले नेता हैं. उनकी तरह के दर्जनों नेता हमारी पार्टी में भी हैं. स्पष्ट है कि महागठबंधन ने उन्हें तीन सीटें जातीय आधार पर दिया है. सीटों के बंटवारे से इसे समझा जा सकता है."
सहनी को बीजेपी ने भी मनाने की कोशिशें की थी. तीन सीटों की बात भी हो गई थी. लेकिन अब मामला उलट है. आखिर मुकेश सहनी को बीजेपी क्यों नहीं मना पायी?
निखिल आनंद कहते हैं, "राजनीति में परिस्थितियां बदलती हैं. जिन परिस्थितियों में सहनी को साथ लेने की बात थीं वे अब नहीं रहीं. बात केवल समुदाय विशेष के कल्याण की नहीं थी, वो तो होनी ही चाहिए. दरअसल, मुकेश सहनी उस समुदाय के नाम पर राजनीति कर रहे हैं."
दूसरी तरफ उनके सहयोगी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव के राजनीतिक सलाहकार संजय यादव कहते हैं कि, "मुकेश सहनी को महागठबंधन में तीन सीटें उनके समुदाय के प्रतिनिधित्व के आधार पर मिली हैं. महागठबंधन की राजनीति सोशल जस्टिस की राजनीति है."
"हमने सीट शेयरिंग में इस बात का पूरा खयाल रखा है कि हर समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व मिले चाहे वह अतिपिछड़े समुदाय का हो या फिर अल्पसंख्यक हो. हम बीजेपी की तरह धर्म की राजनीति नहीं करते."
"अमित शाह ने हमसे गद्दारी की और तब हमारी पॉलिटिकल पार्टी भी नहीं थी. अब हम खुद एक पॉलिटिकल पार्टी हैं, इसलिए उस गद्दारी का हिसाब चुकाने के लिए पॉलिटिकल समझौता किया और लड़ाई लड़ रहे हैं."
लेकिन, जानकार कहते हैं कि सभी मुकेश सहनी को इसलिए भी साथ रखना चाहते हैं क्योंकि इनके पास पैसा बहुत है. अपनी रैलियों और प्रचार-प्रसार में मुकेश ने पैसे की ताक़त भी दिखाई है. फिर चाहे वह चार्टर्ड विमान से पटना आना हो, अख़बारों में बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाना हो, हेलिकॉप्टर से अपने क्षेत्र के दौरे पर निकलना हो या फिर रैलियों में साज-सज्जा और इंतज़ाम की बात हो.
कहते हैं कि राजनीति के शुरुआती दिनों में मुकेश को पटना के किसी होटल में ठहरना पसंद नहीं था. क्योंकि उन्हें यहां की सुविधाएं और इंतजाम नाकाफी लगते थे. चर्चा है कि आगामी चुनाव में भी मुकेश के पैसे की धमक देखने को मिलेगी.
लेकिन, इन सारी चर्चाओं पर तब विराम लग जाता है जब पैसे की बात पर मुकेश कहते हैं, "देखिए मैं मछुआरा का बेटा हूं. मेरे पास पहले की कोई संपत्ति नहीं है. हां, हमने पैसे कमाये हैं और यह काली कमाई नहीं, एक नंबर का पैसा है. एक-एक पैसे का हिसाब है. इनकम टैक्स देता हूं. कमाए हुए पैसे अपने लोगों के लिए खर्च करता हूं. और उतना भी पैसा नहीं है जितना लोग कहते हैं."
मूल रूप से दरभंगा के सुपौल बाज़ार के रहने वाले मुकेश सहनी संजय लीला भंसाली की फ़िल्मों के सेट डिजाइन कर सुर्खियों में आए थे. फिलहाल वो मुंबई में मुकेश सिनेवर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के मालिक हैं. जिसका बेस कैपिटल पांच लाख रुपये है. कंपनी 2013 में ही बनी थी.
मुकेश पहली बार खगड़िया से चुनाव लड़ेंगे. लेकिन उनका घर दरभंगा में है और चर्चा भी यही थी कि महागठबंधन उन्हें दरभंगा से अपना उम्मीदवार बनाएगा. बाद में जब दरभंगा से आरजेडी के अब्दुल बारी सिद्दिकी के नाम पर मुहर लग गई तब यह कयास लगाए जाने लगे कि मुकेश को मुज़फ़्फ़रपुर सीट दी जाएगी.
आखिर में खगड़िया से क्यों? जवाब में सहनी कहते हैं, "समझौते के तहत हमें तीन सीटें लेनी थी. चूंकि खगड़िया नया सीट था. इसलिए हमने उसे चुनौती के रूप में लिया. जहां तक बात मुज़फ़्फ़रपुर सीट की है तो हम वहां से क्यों लड़ें जहां से हमारे लोग जीत सकते हैं?"
"मेरे खयाल से सीटें उतना मायने नहीं रखती हैं, जितना कि मायने रखता है बीजेपी को हराना."
सवाल फिर वही कि क्या मुकेश सहनी को तीन सीटें इसलिए मिली हैं क्योंकि (उनके दावे के मुताबिक) वे निषाद समुदाय के सबसे बड़े नेता हैं ?
बीजेपी के प्रवक्ता निखिल आनंद कहते हैं, "ऐसा नहीं कि मुकेश निषाद समुदाय के अकेले नेता हैं. उनकी तरह के दर्जनों नेता हमारी पार्टी में भी हैं. स्पष्ट है कि महागठबंधन ने उन्हें तीन सीटें जातीय आधार पर दिया है. सीटों के बंटवारे से इसे समझा जा सकता है."
सहनी को बीजेपी ने भी मनाने की कोशिशें की थी. तीन सीटों की बात भी हो गई थी. लेकिन अब मामला उलट है. आखिर मुकेश सहनी को बीजेपी क्यों नहीं मना पायी?
निखिल आनंद कहते हैं, "राजनीति में परिस्थितियां बदलती हैं. जिन परिस्थितियों में सहनी को साथ लेने की बात थीं वे अब नहीं रहीं. बात केवल समुदाय विशेष के कल्याण की नहीं थी, वो तो होनी ही चाहिए. दरअसल, मुकेश सहनी उस समुदाय के नाम पर राजनीति कर रहे हैं."
दूसरी तरफ उनके सहयोगी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव के राजनीतिक सलाहकार संजय यादव कहते हैं कि, "मुकेश सहनी को महागठबंधन में तीन सीटें उनके समुदाय के प्रतिनिधित्व के आधार पर मिली हैं. महागठबंधन की राजनीति सोशल जस्टिस की राजनीति है."
"हमने सीट शेयरिंग में इस बात का पूरा खयाल रखा है कि हर समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व मिले चाहे वह अतिपिछड़े समुदाय का हो या फिर अल्पसंख्यक हो. हम बीजेपी की तरह धर्म की राजनीति नहीं करते."
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